भारत अब केवल रक्षा उपकरणों का खरीदार मात्र नहीं रह गया है; अब वह वैश्विक मंच पर एक प्रमुख निर्यातक के रूप में अपना वर्चस्व स्थापित कर रहा है। सिंगापुर में आयोजित ‘शांगरी-ला डायलॉग’ के दौरान, भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने ऐसी जानकारी साझा की, जो देश के रक्षा क्षेत्र के लिए ‘गेम-चेंजर’ (पासा पलटने वाली) साबित हो सकती है।
भारत ने अपने करीबी साझेदार वियतनाम को घातक ‘ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल’ प्रणाली बेचने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके साथ ही, इंडोनेशिया को भी यह प्रणाली उपलब्ध कराने के लिए चल रही बातचीत अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत का बढ़ता प्रभाव
दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (आसियान) के साथ भारत के व्यापारिक और रणनीतिक संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। रक्षा सचिव ने स्पष्ट किया कि भारत इन मित्र देशों के साथ अपनी सबसे उन्नत रक्षा तकनीक साझा करने में पूरी तरह सहज है। भारत आसियान समूह के सदस्य देशों—ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, तिमोर-लेस्ते और वियतनाम—को अपने प्रमुख साझेदार के रूप में देखता है।
फिलीपींस इस मिसाइल का पहला अंतरराष्ट्रीय खरीदार था, जिसने 2022 में $375 मिलियन का रक्षा सौदा किया था। अब वियतनाम के साथ भी समझौता अंतिम रूप ले चुका है, और मार्च 2026 में इंडोनेशिया ने भी इस संबंध में अपनी सहमति के संकेत दिए थे।
यह रक्षा समझौता ₹60 अरब का हो सकता है
इस नवीनतम रक्षा सौदे के सटीक वित्तीय विवरणों के संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। हालाँकि, मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए यह जानकारी सामने आई है कि भारत और वियतनाम के बीच हुआ यह पूरा सौदा लगभग ₹60 अरब (मोटे तौर पर $629 मिलियन) का हो सकता है।
उम्मीद है कि इस विशाल वित्तीय पैकेज में न केवल मिसाइल प्रणालियाँ शामिल होंगी, बल्कि उनके सही संचालन के प्रशिक्षण से लेकर व्यापक लॉजिस्टिक (रसद) सहायता तक, सब कुछ शामिल होगा।
दुनिया इस मिसाइल की इतनी दीवानी क्यों है?
ब्रह्मोस केवल एक हथियार मात्र नहीं है; यह रक्षा इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ नमूना है। भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस के NPO Mashinostroyenia के संयुक्त प्रयासों से विकसित इस मिसाइल का नाम ब्रह्मपुत्र और मोस्कवा नदियों के नाम पर रखा गया है।
इसकी सबसे खास बात इसकी ज़बरदस्त रफ़्तार है। यह ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना ज़्यादा तेज़ी से उड़ती है (Mach 2.8 से Mach 3)। अपनी इस बेमिसाल रफ़्तार की वजह से, दुनिया के किसी भी मौजूदा हवाई रक्षा सिस्टम के लिए इसे उड़ान के दौरान रोकना लगभग नामुमकिन माना जाता है।
290 से 800 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाली इस मिसाइल को किसी भी प्लेटफॉर्म से लॉन्च किया जा सकता है—चाहे वह ज़मीन हो, हवा हो या समुद्र। रडार की पकड़ से बचने में माहिर यह मिसाइल समुद्र की सतह से महज़ कुछ मीटर ऊपर उड़ सकती है, या ज़रूरत पड़ने पर 15 किलोमीटर की ऊँचाई तक भी जा सकती है।






