शंघाई में भारत के वाणिज्य दूतावास ने गांधी जयंती और अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया। इस कार्यक्रम में विभिन्न देशों के वाणिज्य दूतों, राजनयिकों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सदस्यों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान, महात्मा गांधी की पहली चीनी शिष्या शांति त्सेंग के परिवार को भारत और चीन के बीच आपसी समझ को मजबूत करने में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में सत्य, अहिंसा, शांति और संवाद जैसे गांधीवादी मूल्यों पर चर्चा हुई और साथ ही गांधीजी के पसंदीदा भजनों की लाइव प्रस्तुति भी दी गई। शंघाई में भारत के वाणिज्य दूत प्रतीक माथुर ने सभा को संबोधित किया।
सत्य और अहिंसा के प्रतीक महात्मा गांधी की 157वीं जयंती पर उनके जीवन से जुड़ी खास बातें जानें।
गांधी जयंती 2026 का इतिहास
आज, 2 अक्टूबर 2026 को महात्मा गांधी की 157वीं जयंती मनाई जा रही है। उनके जीवन के इतिहास, अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के महत्व और भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान उनके नेतृत्व में हुए ऐतिहासिक आंदोलनों के बारे में जानें।
हर साल 2 अक्टूबर का दिन न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बहुत ही खास और प्रेरणादायक दिन होता है। इस दिन भारत अपने ‘राष्ट्रपिता’ महात्मा गांधी की जयंती मनाता है।
गांधीजी का जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है; यह सत्य, अहिंसा, त्याग और अटूट संकल्प का प्रतीक है—ऐसे मूल्य जिन्होंने दुनिया को शांति का रास्ता दिखाया है।
समानता, शांति और मानवता के बारे में गांधीजी के आदर्शों ने न केवल भारत की स्वतंत्रता सुनिश्चित की, बल्कि पूरी दुनिया को एक नई दिशा भी दिखाई।
इस साल महात्मा गांधी की 157वीं जयंती शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 को है। इस दिन पूरे भारत में प्रार्थना सभाएं, श्रद्धांजलि कार्यक्रम और यादगार आयोजन किए जाते हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र इस तारीख को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाता है। ऐतिहासिक महत्व:
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके जन्म की याद में हर साल इस शुभ तिथि पर गांधी जयंती मनाई जाती है।
अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस
महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों को वैश्विक स्तर पर सम्मान देने के लिए, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून 2007 को एक प्रस्ताव पारित किया। नतीजतन, 2 अक्टूबर को दुनिया भर में ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
गांधी जयंती का महत्व
2026 में, भारत महात्मा गांधी की 157वीं जयंती मना रहा है। गांधी जयंती का महत्व केवल ‘बापू’ को याद करने तक ही सीमित नहीं है; यह उनके बताए सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेने का दिन भी है। छात्र नीचे इसके महत्व के बारे में जान सकते हैं।
सत्य और अहिंसा का संदेश
बापू ने दिखाया कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत—ब्रिटिश साम्राज्य—को बिना हथियार उठाए भी घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सकता है।
स्वच्छता और आत्मनिर्भरता
गांधी का मानना था कि “स्वच्छता ही ईश्वरत्व है” (cleanliness is next to godliness)। उन्होंने आत्मनिर्भरता और स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल की वकालत की—ये ऐसे विचार हैं जो आज के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्वच्छ भारत अभियान’ (Clean India Mission) की मूल नींव हैं।
सामाजिक समानता
उन्होंने छुआछूत और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी और समाज के वंचित वर्गों को ‘हरिजन’ (ईश्वर की संतान) का नाम देकर उनके सम्मान को बढ़ाया।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी का योगदान
1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद, गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा पूरी तरह बदल दी। उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए आम जनता को एकजुट किया।
उनके नेतृत्व में चलाए गए आंदोलन इस प्रकार हैं:
1.चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह (1917–1918)
भारत में बापू का पहला सफल सत्याग्रह बिहार के चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों के अधिकारों के लिए लड़ा गया था। इसके बाद, उन्होंने गुजरात के खेड़ा में किसानों के लिए टैक्स माफ़ी की मांग को लेकर एक आंदोलन चलाया; इस अभियान ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
2.असहयोग आंदोलन (1920)
गांधी जी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड और रॉलेट एक्ट के विरोध में असहयोग आंदोलन शुरू किया। उन्होंने भारतीयों से ब्रिटिश सामान, स्कूलों, अदालतों और सरकारी नौकरियों का बहिष्कार करने का आग्रह किया।
3.दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930)
क्या आप जानते हैं कि 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने ब्रिटिश नमक कानूनों को तोड़ने के लिए साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील की ऐतिहासिक यात्रा की थी? बाद में, 6 अप्रैल को उन्होंने खुद नमक बनाकर ब्रिटिश एकाधिकार को चुनौती दी।
4.भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, गांधी जी ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अंतिम बड़ा आंदोलन शुरू किया। 8 अगस्त 1942 को उन्होंने प्रसिद्ध नारा “करो या मरो” दिया, जिसने पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी। आखिरकार, 15 अगस्त 1947 को भारत को आज़ादी मिली।
उपाधियाँ: रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी। इसके अलावा, 1944 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया। • ‘राष्ट्रपिता’ (Father of the Nation): सिंगापुर रेडियो पर एक प्रसारण के दौरान पहली बार यह संबोधन दिया गया। • आत्मकथा: बापू की प्रसिद्ध आत्मकथा का शीर्षक ‘द स्टोरी ऑफ़ माय एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ’ (सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी) है।
स्मारक: दिल्ली में यमुना नदी के किनारे स्थित बापू का स्मारक… इस जगह को ‘राजघाट’ के नाम से जाना जाता है।
सारांश
गांधीजी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उनके द्वारा दिखाए गए सत्य, अहिंसा, सद्भाव और स्वच्छता के मार्ग पर चलकर ही एक समृद्ध और शांतिपूर्ण भारत का निर्माण किया जा सकता है।


