आप अलग-अलग जगहों पर निवेश करके बेहतर मौके पाने के लिए अपना पैसा पोर्टफोलियो मैनेजर को सौंपते हैं। अब तक वे कुछ खास निवेश के तरीकों तक ही सीमित थे, लेकिन जल्द ही उन्हें कई और विकल्प मिल जाएंगे। निवेश का दायरा बढ़ने वाला है, जिसमें IPO और विदेशी शेयरों से लेकर डेट सिक्योरिटीज़ तक सब कुछ शामिल होगा।
भारतीय स्टॉक मार्केट के रेगुलेटर, सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (SEBI) ने पोर्टफोलियो मैनेजरों से जुड़े नियमों में बड़े बदलावों को मंज़ूरी दी है। इसके साथ ही, विदेशी निवेश, रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs), इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (InvITs), सेटलमेंट और विज्ञापनों से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए गए हैं।
PMS के ज़रिए निवेश के बढ़े रास्ते
SEBI ने पुराने 2020 के नियमों की जगह नए पोर्टफोलियो मैनेजर नियम मंज़ूर किए हैं। इस कदम से पोर्टफोलियो मैनेजरों (PMS) के लिए निवेश के रास्ते बढ़ेंगे। अब वे SEBI के तय नियमों और सीमाओं के तहत विदेशी लिस्टेड शेयरों, डेट सिक्योरिटीज़, REITs, विदेशी म्यूचुअल फंड, ETF, इंडेक्स फंड और विदेशी सरकारी सिक्योरिटीज़ में निवेश कर सकेंगे। इसके अलावा, क्लाइंट की मंज़ूरी से, पोर्टफोलियो मैनेजर क्लाइंट की कुल ‘एसेट्स अंडर मैनेजमेंट’ (AUM) का 10% तक निवेश-ग्रेड वाली अनलिस्टेड नॉन-कन्वर्टिबल डेट सिक्योरिटीज़ में निवेश कर सकता है।
IPO और प्राइमरी मार्केट का रास्ता खुला
SEBI के नए नियमों से पोर्टफोलियो मैनेजरों के लिए IPO और प्राइमरी मार्केट डेट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करना भी आसान हो गया है। दूसरे शब्दों में, जो निवेशक पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज़ (PMS) के ज़रिए फंड मैनेज करते हैं, उन्हें स्टॉक मार्केट में नए शेयरों के आने पर निवेश के ज़्यादा विकल्प मिलेंगे।
इसके अलावा, भारतीय म्यूचुअल फंड की ‘डायरेक्ट प्लान’ स्कीमों में निवेश की भी इजाज़त दी गई है; इसमें ETF, इंडेक्स फंड और खास इन्वेस्टमेंट फंड शामिल हैं। इस सुविधा के लिए कम से कम ₹25 लाख के निवेश की सीमा तय की गई है। **सेटलमेंट की प्रक्रिया को तेज़ करना**
शेयर बाज़ार से जुड़े विवादों और नियमों के उल्लंघन के मामलों में सेटलमेंट की प्रक्रिया भी बदलने वाली है। SEBI ने सेटलमेंट की रकम तय करने के लिए एक नया फ़ॉर्मूला मंज़ूर किया है। ₹10 लाख तक की रकम वाले मामलों के लिए फ़ास्ट-ट्रैक सेटलमेंट का रास्ता उपलब्ध होगा। गलत तरीके से कमाए गए मुनाफ़े, बचाए गए नुकसान या निवेशकों को हुए नुकसान की वसूली अलग से तय की जाएगी। नए फ़ॉर्मूले का मकसद सेटलमेंट की रकम तय करते समय एक ही नुकसान या रकम की दो बार गिनती होने की समस्या को खत्म करना है।
REITs और InvITs के लिए आसान नियम
SEBI ने REITs और पब्लिकली लिस्टेड InvITs से जुड़े नियमों में भी बदलाव किया है। अब उन्हें मंज़ूरी प्राप्त विदेशी बाज़ारों में डिपॉजिटरी रसीदें जारी करने की इजाज़त होगी। आसान शब्दों में कहें तो, इससे इन इंस्ट्रूमेंट्स के लिए विदेशी पूंजी जुटाने का एक नया रास्ता खुल सकता है।
वोटिंग के नियमों में भी बदलाव किया गया है; अब कुल आउटस्टैंडिंग यूनिट्स का 75% होने के बजाय, असल में डाले गए वोटों का 75% ही काफ़ी होगा। स्पॉन्सर बदलने की स्थिति में एग्ज़िट ऑफ़र से जुड़े नियमों में बदलाव किया गया है और असहमति जताने वाले यूनिटहोल्डर्स के मामले में क्या किया जाएगा, इसे साफ़ किया गया है।
रिसर्च एनालिस्ट और वॉल्ट मैनेजर के लिए नियम
SEBI ने रिसर्च एनालिस्ट और रिसर्च करने वाली संस्थाओं के लिए कुछ कंप्लायंस ज़रूरतों को आसान बना दिया है। इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स के साथ बातचीत का रिकॉर्ड रखने की शर्तों में ढील दी गई है। वहीं, वॉल्ट मैनेजर के लिए कम से कम नेट वर्थ की ज़रूरत को ₹50 करोड़ से बढ़ाकर ₹75 करोड़ कर दिया गया है। नए नियम स्टोरेज, सुरक्षा, इंश्योरेंस, गवर्नेंस और रिस्क मैनेजमेंट से जुड़ी ज़रूरतों को भी मज़बूत करते हैं। वॉल्ट मैनेजर के नियमों में अब गोल्ड और सिल्वर ETF से जुड़ी बुलियन और बुलियन डेरिवेटिव्स भी शामिल हैं।


